रामनगर का चुक्कम गांव: दशकों से अधर में लटका विस्थापन, हर साल झेलते हैं नदी का कहर

रामनगर का चुक्कम गांव: दशकों से अधर में लटका विस्थापन, हर साल झेलते हैं नदी का कहर

#उत्तराखंड के नैनीताल जिले में #रामनगर से लगभग 24-25 किलोमीटर दूर स्थित चुक्कम गांव (चुकुम गांव) के विस्थापन का मामला तीन दशकों से भी अधिक समय से लंबित है, जिससे यहां के ग्रामीणों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण 1993 से अपने विस्थापन का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।

समस्या की जड़:

  • नदी पार करने का जोखिम: #चुक्कमगांव के ग्रामीण और स्कूली बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं। कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने पर गांव का संपर्क मुख्य धारा से पूरी तरह कट जाता है। जलावन लकड़ी के सहारे एक अस्थायी पुल बनाया गया था, जो बरसात में बह जाता है। इसके कारण स्कूली बच्चों को पढ़ाई के लिए 3 किलोमीटर दूर कोसी नदी को पार कर मोहान इंटर कॉलेज जाना पड़ता है।
  • स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का अभाव: ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लगभग 25 किलोमीटर दूर रामनगर आना पड़ता है, जो उनके लिए एक बड़ी चुनौती है।
  • वन्यजीवों का खतरा: #कुनखेत वन मार्ग से साढ़े आठ किलोमीटर का एक वैकल्पिक पैदल रास्ता है, जिसके जरिये ग्रामीण कुनखेत गांव पहुंचते हैं, लेकिन इस रास्ते में वन्यजीवों का खतरा बना रहता है।
  • बाढ़ और कटाव का खतरा: कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने से लगातार कटाव हो रहा है और गांव के बहने का खतरा मंडरा रहा है। 2016 में प्रशासन ने विस्थापन के लिए सर्वे भी किया था, और कई बार बाढ़ में घर और फसलें बह जाने की घटनाएं भी हुई हैं।

लंबे समय से लंबित आश्वासन:

ग्रामीणों को साल 1954 से ही विस्थापन का भरोसा दिया जा रहा है। हर चुनाव से पहले चुक्कम गांव के उद्धार की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, लेकिन वे केवल खोखले वादे साबित होते हैं। इस गांव में करीब 120 परिवार और लगभग 750 की आबादी निवास करती है। उनके विस्थापन को लेकर आज तक कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई गई है।

प्रशासनिक बयान:

सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता तरुण कुमार बंसल ने बताया है कि #चुक्कम गांव के किनारे तटबंध बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। वहीं, रामनगर के उपजिलाधिकारी राहुल शाह ने बताया था कि प्रशासन की टीम राफ्ट के जरिए चुक्कम गांव पहुंची थी और क्षेत्र में आपदा राहत सामग्री बांटी गई थी, साथ ही इलाके का जायजा भी लिया गया था।

ग्रामीणों की आंखें दशकों से #विस्थापन की आस में पथराई हुई हैं, और वे अब भी एक स्थायी समाधान का इंतजार कर रहे हैं ताकि उनकी जान और संपत्ति सुरक्षित रह सके।

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